खून की पहली पुकार
हिंदी हॉरर कहानी - बदले की प्यास और रहस्यमयी ताकत
रात का सन्नाटा जैसे कुछ कह रहा था। हवेली की दीवारें ठंडी थीं लेकिन उनमें हल्की कंपन महसूस हो रही थी, मानो कोई अदृश्य शक्ति उनमें चल रही हो। आरव की आँखें छत पर टिकी थीं, लेकिन दिमाग कहीं और। आवाज़ें उसके मन में गूंज रही थीं — "खून... बदला... मुक्ति..."। उसकी उँगलियाँ अनजाने में तलवार की मुठ पर जा पहुँचीं, जो उसके बिस्तर के पास रखी थी।
धीरे-धीरे उसके चारों ओर की हवा भारी होने लगी। खिड़कियाँ आपस में टकराईं। दीये की लौ काँप उठी और कमरे में हल्की लाल रौशनी फैल गई। आरव की धड़कनें तेज़ थीं। हर सांस के साथ कोई और उसके भीतर उतरता जा रहा था — कोई जो इंसान नहीं था।
गाँव में अशांति
सुबह होते ही जैसे-जैसे सूरज की किरणें गाँव पर पड़ीं, वैसे ही भय का साया और गहरा हो गया। लोगों के बीच खबर फैल गई कि कुछ नकाबपोश गुंडों ने पास के खेतों में काम कर रहे मजदूरों को पीट दिया है। महिलाओं ने अपने घरों के दरवाज़े बंद कर लिए।
आरव ने यह सब सुना तो उसका गुस्सा फूट पड़ा। “अब बहुत हुआ!” वह चिल्लाया। उसके अंदर की ताकत जैसे जाग उठी। वह हवेली के तहखाने में गया और उसी प्राचीन तलवार को उठाया, जो उसके पूर्वजों की थी। कहा जाता था कि यह तलवार सिर्फ न्याय के लिए उठाई जाती है, पर इसका खून प्यास कभी नहीं बुझती।
पहला शिकार
शाम होते ही आरव गाँव पहुँचा। बदमाश अड्डे पर बैठकर हँस रहे थे। उन्होंने आरव को देखा और उसका मज़ाक उड़ाया। तभी अचानक हवा तेज़ हो गई। जमीन से धूल उठी। और आरव ने तलवार उठाई — केवल एक वार में आग की लपटें उठीं। पहला बदमाश वहीं गिर पड़ा, उसका खून जमीन में समा गया। बाकी भाग खड़े हुए।
आरव को भीतर एक अजीब-सी शांति महसूस हुई, लेकिन उस शांति में एक डर भी था। उसके कानों में फिर वो आवाज़ आई — "रुको मत... अभी और खून बाकी है!"
साधु की चेतावनी
अगले दिन जंगल के रास्ते में एक वृद्ध साधु मिला। उसने कहा, “जिस दिन यह तलवार तू छोड़ देगा, उसी दिन तेरा उद्धार होगा। लेकिन अगर तूने इसे और खून दिया — तो यह तुझे निगल जाएगी।”
आरव ने उसकी ओर देखा, “मैं अन्याय नहीं सह सकता।” साधु मुस्कराया, “तू न्याय नहीं, बदला ले रहा है। अंतर समझ।” फिर वह धुएँ में विलीन हो गया।
अनन्या की चुप्पी
अनन्या हवेली में खिड़की के पास बैठी थी। उसकी आँखों में आंसू और डर दोनों थे। “आरव, तुम वो नहीं रहे जो कभी थे। तुम्हारे भीतर कुछ और बस गया है।”
आरव ने कुछ नहीं कहा, बस तलवार को कसकर पकड़ा। वह जानता था कि अब यह मोहलत सिर्फ उसे और विनाश को अलग कर रही थी।
रहस्यमयी हमला
अगली सुबह हवेली की दीवार पर खून से लिखा मिला — “तू अकेला नहीं है, आरव। अब खेल मेरा है।”
रात होते ही हवा में एक धुंध फैली। दरवाज़े अपने आप खुलने लगे। हवेली की गलियों में किसी के कदमों की आहट आई। अचानक आरव के कमरे में धुंध एक बवंडर बनी और उससे दो लाल आँखें चमकीं। एक काली आकृति तलवार के सामने उभरी।
आवाज़ आई — “बदला तेरा नहीं... बदला मेरा है। तू सिर्फ जिंदा औजार है।”
आरव चीखा — “तू कौन है?”
आकृति हँसी — “जिस खून से तूने न्याय किया, वही खून अब तुझे पुकार रहा है।”
अंत की शुरुआत
तलवार हवा में तैरने लगी। उसका ब्लेड तेज रोशनी से जल उठा। आरव ने उसे थामने की कोशिश की लेकिन उसके हाथ झुलस गए। कमरा लाल रोशनी में डूब गया। बाहर बिजली कड़की और हवेली की छत हिल उठी।
अनन्या ने दरवाज़ा खोला तो देखा कि कमरे में सिर्फ धुआं था और तलवार खुद बिस्तर पर रखी थी — उसके ऊपर आरव की परछाईं बस हल्की सी बची थी। दूर जंगल से फिर वही आवाज़ आई — “पहला खून बस शुरुआत थी…”

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