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Karva Chauth Kab Hai 2025? करवा चौथ कब है 2025?

करवा चौथ 2025 कब है?

इस साल करवा चौथ 10 अक्टूबर 2025, शुक्रवार को मनाया जाएगा। यह कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि होगी। तिथि का आरंभ 9 अक्टूबर की रात 10:54 बजे से और समाप्ति 10 अक्टूबर की शाम 7:38 बजे तक रहेगा।

इस दिन चंद्रमा का उदय 7:41 बजे होगा। पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 5:57 बजे से 7:11 बजे तक रहेगा। महिलाएं इस समय के बीच चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत खोलती हैं।

करवा चौथ का इतिहास और धार्मिक महत्व

करवा चौथ का उल्लेख प्राचीन काल से मिलता है। यह पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि वैवाहिक निष्ठा, प्रेम और विश्वास का प्रतीक है। इसे प्रियतमा पर्व भी कहा गया है क्योंकि इस दिन पत्नियां अपने प्रिय की दीर्घायु की कामना करती हैं।

पुराणों के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी। उनकी श्रद्धा से प्रभावित होकर शिव जी ने उन्हें अपना अर्धांगिनी बनाया। इसी घटना से प्रेरित होकर यह पर्व आरंभ हुआ।

भौगोलिक और सांस्कृतिक परंपराएं

पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश तथा गुजरात में इस त्योहार की विशेष धूम रहती है। गांवों में महिलाओं के समूह गीत गाकर कथा सुनती हैं, जबकि शहरों में यह अवसर श्रृंगार और पारंपरिक रीतियों से जुड़ा सामाजिक उत्सव बन गया है।

कई जगह करवा चौथ पर मेहंदी और श्रृंगार प्रतियोगिताएं भी होती हैं। करवा (मिट्टी का पात्र) में जल और धान भरकर पूजा की जाती है, जो सौभाग्य और समृद्धि का प्रतीक है।

करवा चौथ की पूजा विधि

सुबह सूर्योदय से पहले ससुराल से मिली सरगी खाने की परंपरा है। इसमें फल, मिठाई, सूखे मेवे, पराठे और दूध से बनी चीजें शामिल होती हैं। महिलाएं पूरे दिन निर्जला व्रत रखती हैं।

शाम को साड़ी या पारंपरिक परिधान पहनकर वे सिंदूर, चूड़ी, और मेहंदी से श्रृंगार करती हैं। पूजा के दौरान करवा, दीपक, रुई, जल, अक्षत और फूल रखे जाते हैं। कथा सुनने के बाद महिलाएं घर के द्वार पर दीपक जलाती हैं और चंद्र दर्शन के बाद पति से आशीर्वाद लेकर व्रत खोलती हैं।

करवा चौथ 2025 का मुहूर्त

  • व्रत प्रारंभ: 9 अक्टूबर 2025, सूर्योदय से
  • पूजा मुहूर्त: 10 अक्टूबर 2025, शाम 5:57 बजे से 7:11 बजे तक
  • चंद्र उदय: 10 अक्टूबर 2025, शाम 7:41 बजे
  • तिथि समाप्ति: 10 अक्टूबर 2025, शाम 7:38 बजे

करवा चौथ कैसे मनाएं?

  • सुबह सरगी का सेवन करें, जो सास की ओर से दी जाती है।
  • पूरा दिन निर्जला व्रत रखें और दिनभर भगवान शिव-पार्वती की आराधना करें।
  • शाम को करवे, दीपक, सिंदूर, चावल और जल से पूजा करें।
  • कथा सुनें और समूह में भक्ति गीत गाएं।
  • चंद्र दर्शन के बाद छलनी से देखकर पति के हाथ से जल ग्रहण करें।

धार्मिक और सामाजिक लाभ

करवा चौथ का व्रत पति-पत्नी के रिश्ते को मजबूती देता है। यह नारी की शक्ति, श्रद्धा और त्याग का प्रतीक है। मान्यता है कि इस व्रत से परिवार में सुख, समृद्धि बढ़ती है और नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है।

यह त्योहार नारी-सम्मान का भी संदेश देता है और परिवारिक सौहार्द की भावना को बल देता है।

करवा चौथ 2025 के खास योग और ग्रह स्थिति

  • इस वर्ष करवा चौथ के दिन अमृत सिद्धि योग और सर्वार्थ सिद्धि योग बन रहे हैं।
  • संकष्टी चतुर्थी के साथ यह तिथि पड़ने से धार्मिक दृष्टि से विशेष फलप्रद मानी जा रही है।
  • गुरु-चंद्रमा का नवपंचम योग बन रहा है जो वैवाहिक जीवन और करियर उन्नति के लिए शुभ माना गया है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण

आधुनिक विज्ञान के अनुसार, उपवास शरीर के डिटॉक्स में मदद करता है और मानसिक एकाग्रता बढ़ाता है। प्राचीन परंपराओं में पर्वों को चंद्र चक्र से जोड़ने का कारण यही था कि मनुष्य प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाए रखे।

आधुनिक महिलाओं के लिए सुझाव

  • सरगी में पोषक आहार जैसे फल, सूखे मेवे और दूध लें ताकि दिनभर ऊर्जा बनी रहे।
  • अत्यधिक थकावट होने पर आराम करें और तनाव कम करें।
  • अगर स्वास्थ्य संबंधी कोई समस्या हो, तो चिकित्सक की सलाह लें।
  • पूजा के बाद परिवारजनों का आशीर्वाद लें और साथ मिलकर पर्व मनाएं।

करवा चौथ से जुड़ी सामान्य जिज्ञासाएं

प्रश्न: करवा चौथ 2025 कब है?
उत्तर: 10 अक्टूबर 2025, शुक्रवार को।

प्रश्न: व्रत कब शुरू और कब समाप्त होता है?
उत्तर: सूर्योदय के बाद सर्गी से प्रारंभ होकर चंद्र दर्शन के बाद समाप्त होता है।

प्रश्न: क्या अविवाहित महिलाएं भी यह व्रत रख सकती हैं?
उत्तर: हां, कुछ स्थानों पर अविवाहित कन्याएं अच्छे वर की प्राप्ति हेतु व्रत रखती हैं।

प्रश्न: क्या इस दिन चंद्रमा न दिखे तो क्या करें?
उत्तर: बादल या वर्षा की स्थिति में चंद्रमा को दिशा अनुसार प्रणाम कर व्रत खोल सकते हैं।

निष्कर्ष

करवा चौथ केवल एक धार्मिक पर्व नहीं बल्कि घर-परिवार में प्रेम, आस्था और एकता का प्रतीक भी है। बदलते युग में भी यह परंपरा उतनी ही जीवंत है जितनी सदियों पहले थी। यह दिन महिलाओं की शक्ति, त्याग और समर्पण की अमर मिसाल प्रस्तुत करता है।

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