महालक्ष्मी माता व्रत व पूजा विधि | Mahalakshmi Mata Vrat Katha and Puja Vidhi
कनागत अष्टमी पर की जाने वाली महालक्ष्मी माता की विशेष पूजा विधि (Mahalakshmi Mata Puja Vidhi) व कथा विस्तार से पढ़ें। व्रत सामग्री, सही पूजा विधि, कथा, FAQs और महत्व जानें।
परिचय (Introduction)
भारत विविधताओं की भूमि है जहां परंपराएं और लोक आस्थाएं ही जीवन का आधार हैं। उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों में कनागत की अष्टमी को महालक्ष्मी माता की विशेष पूजा होती है। यह व्रत घर-परिवार की सुख-समृद्धि, संतान-सुख प्राप्ति, विपत्तियों से रक्षा और आर्थिक सम्पन्नता के लिए अत्यंत कल्याणकारी माना गया है। इस दिन महिलाएं स्नान-सिंगार कर, विधिवत पूजा कर, कथा सुनती हैं और दीपदान करती हैं।
पूजा सामग्री (Puja Samagri)
- सिंगार का सामान
- 16 चावल के दाने
- 16 गांठ वाला रेशमी धागे से बना गड़ा
- 16 दूब (घास)
- 16 बरगद के पौड़
- 4 पूरी और 4 मीठी पूरी
- मिट्टी का हाथी
- 16 दीपक
- तांबे का लोटा जल से भरा हुआ
- पटा या स्वच्छ कपड़ा
- चंदन
- महावर (पैरों के लिए)
पूजा विधि (Puja Vidhi Step by Step)
- स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और पैरों में महावर लगाएं।
- 16 गांठ वाले गड़े को दूब के साथ बांधें और उससे अपने अंगों पर 16 बार जल छिड़कें।
- जल छिड़कने का क्रम: सिर, आंखें, कान, नाक, मुंह, गला, छाती, दाहिना-बायां कंधा, पेट, जांघ, घुटने, पिंडली, एड़ी, पैर और सम्पूर्ण शरीर।
- जल भरे तांबे के लोटे में बरगद के पौड़ डालें। ऊपर 4 पूरी और 4 मीठी पूरी रखें।
- लोटे को पटा पर रखें, समीप मिट्टी का हाथी और 16 दीपक जलाएं।
- गणेश जी, गौरी माता, लक्ष्मी माता और अंत में मिट्टी के हाथी की पूजा करें।
- फिर महालक्ष्मी माता की व्रत कथा सुनें।
महालक्ष्मी माता की व्रत कथा (Mahalakshmi Mata Vrat Katha)
एक समय की बात है, एक राजा थे जिनके कोई संतान नहीं थी। एक दिन वे जंगल में गए तो उन्होंने परियों को 16 कुल्ला में 16 गांठ वाले धागे से बने गड़े से जल छिड़क कर पूजा करते देखा। राजा ने पूछा तो परियों ने बताया यह महालक्ष्मी माता का व्रत है। इससे मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। राजा ने भी व्रत विधि जानी और गड़ा लेकर महल आए। रानी ने उसे फेंक दिया लेकिन दासी ने respectfully उसे उठाया और पूजा की। महालक्ष्मी की कृपा से उसे पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई।
रानी को शारीरिक कष्ट और कुबड़ा रोग हो गया। जब पता चला कि कारण माता लक्ष्मी का अपमान है, तो रानी ने छिपकर कथा सुनी। कथा के अंत में दीपक का प्रभाव होने से रानी का रूप सूअर जैसा हो गया। अंततः वह एक ऋषि के पास पहुंची जिन्होंने कृपा से उसे कन्या बना दिया।
राजा ने समय बाद उसे पहचान लिया और विधिपूर्वक विवाह हुआ। ऋषि ने आश्रम की देहरी रोककर कन्या (रानी) को विदा किया। राजा और रानी सुखपूर्वक जीवन बिताने लगे।
हे महालक्ष्मी माता, जैसे आपने राजा-रानी पर कृपा की थी वैसे ही हम सब पर भी कृपा करें।
पूजन के समय बोले जाने वाले मंत्र
कथा समाप्त होने के बाद प्रत्येक चावल-दूब को हाथी के पास रखते हुए यह मंत्र बोला जाता है:
"अमोती दमोती पोला पटपट मुगलसराय राजा महते नोला बरुआ बम बम बरुआ काली काली महाकाली महालक्ष्मी हमसे कहती तुमसे सुनती सोलह बोल की एक कहानी।"
इसी प्रकार 16 बार यह मंत्र बोलकर अर्पण करें।
दीपदान की प्रक्रिया (Deepdaan Vidhi)
- 16 दीपक जलाएं।
- एक दीपक घर के जल निकास स्थान पर रखें।
- दोनों पैरों के बीच से जल लेकर उस दीपक पर 16 बार छिड़कें और कहें — "काले तिल जौ हरियारे, बांधे बिछड़े छूटे मिले।"
- ध्यान रहे, दीपक बुझना नहीं चाहिए।
- पूजा पूर्ण कर प्रसाद वितरित करें।
महालक्ष्मी माता व्रत का महत्व (Significance)
- संतान-सुख की प्राप्ति कराता है।
- दुर्भाग्य और रोगों से रक्षा करता है।
- आर्थिक समृद्धि प्रदान करता है।
- पारिवारिक मनमुटाव दूर करता है।
- मनोकामनाएं पूर्ण करता है।
निष्कर्ष (Conclusion)
महालक्ष्मी माता का व्रत केवल धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि जीवन की कठिनाइयों को हरने और सुख-समृद्धि प्राप्त करने का एक मार्ग है। जो भक्त सच्चे मन से इसका पालन करता है, उसे लक्ष्मी कृपा से धन, वैभव और संतति का सुख प्राप्त होता है।
"हे महालक्ष्मी माता, जैसे आपने उस राजा-रानी पर कृपा की थी, वैसे ही हम सब पर सदैव अपनी कृपा बनाए रखें।"
FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)
Q1. महालक्ष्मी माता का यह विशेष व्रत किस दिन किया जाता है?
यह व्रत उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों में कनागत अष्टमी के दिन रखा जाता है।
Q2. इस व्रत में कितने दीपक जलाए जाते हैं?
कुल 16 दीपक जलाए जाते हैं।
Q3. मिट्टी के हाथी का क्या महत्व है?
मिट्टी का हाथी लक्ष्मी माता के वाहन और समृद्धि का प्रतीक है।
Q4. क्या यह व्रत केवल महिलाएं ही कर सकती हैं?
मुख्य रूप से महिलाएं करती हैं, पर कोई भी श्रद्धालु यह व्रत रख सकता है।
Q5. क्या व्रत की कथा सुनना अनिवार्य है?
हाँ, कथा सुनना व्रत का मुख्य अंग है। बिना कथा व्रत अधूरा रहता है।

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