भोला भक्त और श्रीराम की कथा
भक्ति, सरलता और एकादशी व्रत का महत्व
Introduction
भारतीय संस्कृति और धर्मग्रंथों में भक्ति और सरलता का महत्व सबसे बड़ा माना जाता है। जो भक्त पूरी श्रद्धा और सच्चाई के साथ भगवान को याद करता है, वहां भगवान स्वयं प्रकट होकर उसके संकट हरते हैं। ऐसी ही एक रोचक, प्रेरणादायक और ह्रदय छू लेने वाली कथा है भोला भक्त और भगवान श्रीराम की एकादशी वाली कहानी।
इस कहानी में हम देखेंगे कि कैसे भोला, जो देखने में आलसी और सरल प्रकृति का इंसान था, अपनी मासूमियत और भक्ति के सहारे अंततः भगवान श्रीराम और माता सीता की कृपा का अधिकारी बन गया। यह कृति हमें यह सिखाती है कि ज्ञान और ग्रंथ पढ़ने से भी बड़ा महत्व भक्त की निर्दोष श्रद्धा और सीधी सरल भावना का होता है।
भोला भक्त की आदतें और परिवार की परेशानी
एक गांव में भोला नाम का रामभक्त रहता था। भोला पूरे दिन बस "राम राम" जपता और प्रभु का गुणगान करता। लेकिन उसकी दो कमजोरियां थीं—
- वह बहुत आलसी था।
- वह बिना खाए रह नहीं सकता था।
उसकी इस आदत से परिवार वाले परेशान थे। एक दिन घर वालों ने सोचा कि भोले को मंदिर भेज दिया जाए, जहां वह भक्ति भी करेगा और वहीं भोजन मिल जाएगा।
मंदिर में भोले की खुशी
भोला मंदिर पहुंचकर खुश हुआ। उसे लगा कि अब तो मुफ्त में भोजन मिलेगा और दिनभर प्रभु का नाम जपने को मिलेगा। लेकिन तभी एकादशी का व्रत आया।
उसने गुरुजी से पूछा, "गुरुजी, आज भोजन क्यों नहीं बना?" गुरुजी ने कहा, "भोला, आज एकादशी है। सब व्रत कर रहे हैं, अतः आज भोजन नहीं बनेगा।"
भोला की मासूम भक्ति
भोला तालाब के किनारे गया और भोजन बनाया। फिर उसने भगवान श्रीराम को याद किया, "हे प्रभु, आओ और भोजन ग्रहण करो। उसके बाद मैं खाऊंगा।"
भोला यह समझ बैठा कि भगवान स्वयं आकर खाना खाएंगे। आश्चर्य की बात कि भगवान श्रीराम सचमुच प्रकट हुए और सारा भोजन खा गए। भोला भूखा रह गया।
एकादशी का क्रम जारी
- दूसरी बार श्रीराम माता सीता को साथ लाए और भोजन कर गए।
- तीसरी बार लक्ष्मण के साथ आए और सारा भोजन कर गए।
- चौथी बार श्रीराम पूरे परिवार के साथ आए—भरत, शत्रुघ्न और हनुमान सहित।
भोला अब सोचने लगा, "गुरुजी ने मुझे फंसा दिया है। मैं भोजन बनाऊं और यह सब खा जाएं!"
भोला की मासूम शिकायत और दिव्य लीला
अगली एकादशी पर उसने भोजन नहीं बनाया और प्रभु को बुलाया। जब श्रीराम परिवार सहित आए तो देखा—भोजन नहीं बना।
भोला बोला, "हर बार आप सब खा जाते हैं, मेरे लिए कुछ नहीं बचता। आज आप स्वयं बनाएं और खाएं!" भोले की निष्कपटता देखकर भगवान प्रसन्न हुए।
माता सीता और श्रीराम का भोजन बनाना
- माता सीता ने आटा गूंथा।
- श्रीराम ने रोटियां बेलीं।
- लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न, हनुमान सब सेवा में लगे।
देवता और गंधर्व आकाश से यह अद्भुत दृश्य देखने आए।
गुरुजी और भोला की भिन्न दृष्टि
गुरुजी छुपकर देखने लगे पर उन्हें कुछ नहीं दिखा। भोले ने कहा, "आपको नहीं दिख रहा? मेरे सामने स्वयं श्रीराम और माता सीता हैं!"
श्रीराम ने कहा, "भोला के अंदर सरलता है। तुम्हारे पास ज्ञान है पर भाव नहीं, इसलिए तुम्हें हम नहीं दिखते।"
गुरुजी का पतन और उद्धार
गुरुजी ने अपनी भूल स्वीकार की और क्षमा मांगी। तब भगवान श्रीराम पूरे परिवार के साथ प्रकट हुए और अंतर्ध्यान हो गए।
Moral of the Story (कहानी की शिक्षा)
- ईश्वर विद्वता से नहीं बल्कि सरल भक्ति से प्रकट होते हैं।
- भक्ति में निष्कपटता का महत्व सबसे बड़ा है।
- ज्ञान तभी सार्थक है जब उसमें विनम्रता और सरलता भी हो।
- ईश्वर भक्त की मासूम अरदास अवश्य सुनते हैं।
Conclusion
भोला भक्त और भगवान श्रीराम की यह कथा सिखाती है कि सच्चे भक्त के लिए भगवान स्वयं प्रकट होते हैं। जो श्रद्धा और सरलता से भक्ति करता है, उसे कभी निराशा नहीं मिलती।
FAQs
Q1: इस कहानी से हमें क्या सीख मिलती है?
भगवान केवल साधारण और सरल भक्ति से ही प्रसन्न होते हैं।
Q2: क्या भगवान सचमुच दिखाई देते हैं?
जब भक्ति निष्कपट होती है, तो भगवान अपनी उपस्थिति का अनुभव कराते हैं।
Q3: एकादशी व्रत का महत्व क्या है?
एकादशी व्रत पापमोचक माना गया है और यह भगवान विष्णु तथा श्रीराम का प्रिय दिन है।
Q4: गुरुजी क्यों नहीं देख पाए लेकिन भोला देख पाया?
क्योंकि गुरुजी में विद्वता तो थी, लेकिन भोले जैसी मासूम सरलता नहीं थी।

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