कंजूस सेठ और भगवान की लीला
Kanjus Seth Aur Bhagwan Ki Leela | प्रेरणादायक हिंदी कहानी
परिचय: यह कहानी सुदामा नगरी के सेठ रामचंद्र की है, जो धन-दौलत में डूबे थे पर दया और दान से कोसों दूर थे। भगवान की लीला ने उन्हें ऐसा अनुभव दिया कि उनका पूरा जीवन बदल गया।
सुदामा नगरी का कंजूस सेठ
सुदामा नगरी के बीचों-बीच भव्य हवेली में रहने वाला सेठ रामचंद्र नगर का सबसे अमीर व्यक्ति था। लोग उसकी संपत्ति की चर्चा दूर-दूर तक करते थे, लेकिन उसके कंजूस स्वभाव से सभी दुखी थे।
- सेठ हर सुबह अपनी दुकान खोलता और पैसों को धूप में रखकर फिर तिजोरी में बंद करता।
- कर्मचारियों को कम वेतन देता और गलती होते ही पैसे कटवा लेता।
- नगर के निर्धन लोग उससे सहानुभूति की उम्मीद करते, पर निराश होकर लौटते।
समाज के पंडित और शास्त्री उसे समझाते, “सेठ जी, प्रभु के नाम पर कुछ दीजिए। धन बाँटने से घटता नहीं, बढ़ता है।” लेकिन वह हँसकर कह देता, “मेरे पास खुद के लिए कुछ नहीं, दान क्या दूँ?”
भागवत कथा ने बदली सोच
एक दिन नगर के चौराहे पर भागवत कथा चल रही थी। जिज्ञासावश सेठ वहाँ पहुँचा और सुना — “भगवान जब चाहें, तभी जीव को अन्न मिलता है। उनकी इच्छा के बिना एक पत्ता तक नहीं हिलता।”
सेठ ने मन में सोचा, “क्या सच में भगवान मुझे ज़बरदस्ती खिला सकते हैं? आज देखूँगा।” उसी रात उसने एक प्रयोग करने का निश्चय किया।
रात का जंगल और सेठ की प्रतिज्ञा
रात के अंधेरे में सेठ जंगल पहुँचा और पेड़ की ऊँची डाल पर चढ़ गया। उसने संकल्प लिया — “आज भगवान चाहे जो करें, मैं खाना नहीं खाऊँगा।”
जंगल में ठंडी हवा और डरावना सन्नाटा था। भूख से व्याकुल होते हुए भी उसका अहंकार उसे रोके रखता।
मध्यरात्रि का चमत्कार
रात के चौथे प्रहर में एक वृद्धा आई। उसके हाथ में पूजा की थाली थी जिसमें अन्न था। उसने पेड़ के नीचे थाली रखकर नमस्कार किया और लौट गई।
सेठ सब देखता रहा, लेकिन अपनी जिद्द में थाली को नहीं छुआ। तभी कुछ कदमों की आहट हुई…
चोरों की टोली और नया मोड़
चार चोर वहाँ पहुँचे, अपने चोरी के माल को बाँटने के लिए। उनमें से एक ने थाली देखकर कहा, “यह खाना कौन रख गया?” फिर उन्हें ऊपर बैठे सेठ की झलक दिखी।
शक करते हुए चोर बोले, “नीचे उतर नहीं तो डंडा पड़ेगा!” डर के मारे सेठ पेड़ से उतरा।
सेठ का सच और भगवान की लीला
सेठ ने सच्चाई बताई कि वह भगवान की परीक्षा ले रहा था, मगर चोरों ने उस पर विश्वास नहीं किया। उन्होंने कहा, “पहले खाना खा कर दिखा!”
डर, भूख और अपमान के बीच सेठ ने काँपते हाथों से अन्न ग्रहण किया। उसी क्षण उसे भीतर से अनुभूति हुई – यह कोई संयोग नहीं, भगवान की ही लीला थी।
सेठ की घर वापसी और परिवर्तन
सुबह वह थका-मांदा घर पहुँचा। उसकी आँखों में आँसू और मन में पछतावा था। उसने भगवान के आगे सिर झुकाकर कहा –
इसके बाद सेठ ने दया, भक्ति और सेवा का मार्ग अपनाया। अब वह किसी जरूरतमंद को खाली हाथ नहीं लौटाता था।
- मंदिर में नियमित दान देने लगा।
- गरीबों के लिए भोज और सहायता शुरू की।
- व्यापार में ईमानदारी और विनम्रता को अपनाया।
समाज की प्रतिक्रिया
नगरवासी सेठ के परिवर्तन से आश्चर्यचकित थे। उसकी पत्नी रोज उसके साथ मंदिर जाने लगी। बच्चे उसे प्यार से “दयालु सेठ” कहने लगे।
एक बुजुर्ग ने कहा, “जो पहले कठिन लगा, वही आज सबके लिए प्रेरणा बन गया।”
जीवन का संदेश
सेठ की कहानी हमें सिखाती है कि धन और अहंकार क्षणिक हैं। सच्चा सुख भक्ति, सेवा और विनम्रता में है। भगवान हर व्यक्ति को सही मार्ग दिखाते हैं, चाहे वह किसी भी स्थिति में क्यों न हो।
सीख:
- अहंकार और लालच हमें केवल दुःख देते हैं।
- भगवान की इच्छा के बिना कुछ भी संभव नहीं।
- सच्ची भक्ति और सेवा सबसे बड़ा धन है।
Moral of the Story:
True happiness comes when we let go of our ego and move toward faith, kindness, and service. God always listens — sometimes through experiences that change our hearts forever.
FAQs
Q1: कंजूस सेठ की कहानी का मूल संदेश क्या है?
भगवान की इच्छा सर्वोपरि है। जो व्यक्ति अहंकार में जीता है, उसे भगवान सही राह दिखाने के लिए लीला करते हैं।
Q2: क्या यह कहानी वास्तविक घटना पर आधारित है?
नहीं, यह एक प्रेरक नैतिक कहानी है, जो हमें सही जीवनमूल्यों का संदेश देती है।
Q3: बच्चों के लिए यह कहानी क्यों उपयुक्त है?
यह कहानी सेवा, दया और ईमानदारी जैसे गुणों को बच्चों के हृदय में स्थापित करती है।

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